मसूरी के होटल में पति के दोस्त और उनकी बीवियाँ-1

(Mussoorie Ke Hotel Me Pati Ke Dost Aur Unki Biviyan- Part 1)

मंजू शर्मा 2017-01-04 Comments

This story is part of a series:

मेरा नाम सपना है, मेरे पतिदेव का नाम रमेश है, हम यमुनानगर (हरियाणा) से हैं।
हम एक आम पति पत्नी जैसे ही हैं, न ज्यादा मोटे न ज्यादा पतले!
हाँ, मैं इतना कह सकती हूँ कि मेरे मम्मे आम औरतों से थोड़े ज्यादा बड़े हैं और यही मेरे में सबसे बड़े आकर्षण का केंद्र हैं।

बात सन 2007 की है, हमारी शादी को तीन को साल हो गए थे, मेरे अभी कोई बच्चा नहीं हुआ था, मैं दो बार माँ बनते बनते रह गई जिस कारण मैं उदास रहती थी। मेरे पति रमेश मुझे किसी न किसी तरीके से खुश रखने की कोशिश करते रहते थे।

15 अगस्त की छुट्टी पर हमने 3-4 दिन मसूरी, देहरादून घूमने का प्रोग्राम बनाया। हम 15 अगस्त को दोपहर ढाई बजे मसूरी पहुँच गए।
हमने एक होटल में जो माल बाजार से आगे थोड़ा ऊँचाई पर था, में एक कमरा लिया। लंच करके हमने 2 घंटे आराम किया और 6 बजे घूमने निकल गए।

जब हम माल रोड पर घूम रहे थे तो हमें रमेश के एक बहुत पुराने मित्र नितिन और रजनी जो दिल्ली से आये थे, मिल गए।
उनके साथ एक उनके मित्र अशोक और डिम्पी भी आये हुए थे।

काफी देर तक हम एक साथ घूमते रहे, काफी वगैरह पी।
अब तक 8 बज चुके थे, हम जब उनसे विदा लेने लगे तो निनित ने हमें डिनर उनके साथ करने का प्रस्ताव रखा जो हमने मान लिया। अब तक अशोक और डिम्पी भी हमारे साथ खुल गए थे।

वे लोग एक प्राइवेट गेस्टहाउस में ठहरे थे जो थोड़ा निचाई पर और काफी शांत जगह पर था। उन्होंने टॉप (थर्ड) फ्लोर पर एक फॅमिली सुइट लिया था जो काफी आलिशान था।

कुछ देर इधर उधर की बातें करते रहे, तब तक डिनर भी आ गया। डिनर करते करते मैंने और रमेश ने एक बात नोट की कि नितिन जो हमारे सामने बैठा था, उसकी नज़र लगातार मेरे मम्मों पर थी जो लगभग आधे से थोड़े कम लो कट ब्लाउज़ से बाहर नजर आ रहे थे।

मैंने उन्हें साड़ी से ढकने की कोशिश की तो रमेश ने मुझे नीचे से पैर मार दिया जिसका मतलब मैं समझ गई कि मैं वैसे ही बैठी रहूँ।
डिनर करके लगभग 10 बजे अपने होटल आ गए।
कमरे में घुसते ही रमेश ने मुझे अपनी गोद में उठा लिया और बेड पर पटक दिया। लगभग 15 मिनट में हम चूमा चाटी करते हुए कपड़ों से बाहर थे।

तब शुरू हुआ चूसन चुसाई का दौर जो लगभग आधा घंटा चला।
जैसे ही रमेश ने मेरी चूत में अपना लंड डाला तो बोला- साला नितिन तेरे मम्मों को ऐसे घूर रहा था जैसे वहीं पर तेरा ब्लाउज़ फाड़ देता और तुझे चोद देता।
तो मैं बोली- मान लो अगर वो ऐसा कर देता तो तुम क्या करते?
‘तो मैं उसकी रजनी की गांड फाड़ देता।’

इस तरह हम अपना काम ख़त्म करके सो गए।

अगली सुबह-सुबह ही नितिन का फोन आया- सभी की इच्छा है कि तुम अपना होटल छोड़कर हमारे गेस्टहाउस में शिफ्ट हो जाओ।

हमें यह प्रस्ताव अच्छा लगा और हम दोपहर को चेकआउट करके उनके गेस्टहाउस में शिफ्ट हो गए। हमने उनके साथ वाला कमरा ले लिया।
कमरे में अपना सामान रख कर हम उनके कमरे में आ गए। थोड़ी देर बातें करते रहे तब तक लंच का टाइम हो गया, लंच का आर्डर किया गया।

तभी अशोक ने सुझाव दिया कि लंच से पहले एक दो पैग लगाये जाएँ।
सभी ने यह सुझाव मान लिया।

तीनों मर्द व्हिस्की के पैग लगाने लगे। अशोक ने अपने बैग में से वोडका निकाली और रजनी और डिम्पी के लिए भी पैग बना दिए।
वो दिल्ली की थी और उन्हें इससे कोई ऐतराज़ नहीं था।
अशोक ने रमेश से मेरे लिए भी पूछा लेकिन मैंने खुद ही मना कर दिया।

लंच आ गया। लंच खत्म होते होते अशोक 4 पैग लगाकर पूरे नशे में हो चुका था। डिम्पी, रजनी, नितिन और रमेश भी 2-2 पैग लगाकर हल्के सुरूर में थे।

बीच-बीच में चुटकले भी चल रहे थे। और फिर चुटकलों के बीच में नॉन वैज चुटकले और शेरो शायरी भी चलती रही।
नतीजा यह हुआ कि सभी पूरी तरह खुल चुके थे।

वे लोग इसी तरह मस्ती और मजाक कर रहे थे और मैं बेड से नीचे कालीन पर बैठी अपना मनपसन्द टी वी सीरियल लगा कर बैठ गई।
तभी अशोक बोला- क्या भाभी, बोर कर रही हो? सीरियल तो घर में भी देखती होंगी, बाहर आई हो कुछ एन्जॉय करो।

तभी मेरा ध्यान अशोक की तरफ गया जो मेरी पीठ की तरफ बैठा था। मैंने देखा कि वो डिम्पी को कभी गालों पर तो कभी गर्दन पर चूम रहा था और अपने एक हाथ से उसके मम्मों को भी दबा रहा था। डिम्पी का भी एक हाथ अशोक की पैंट के उठे हुए भाग पर था। नितिन, रजनी और रमेश उन्हें देख देख कर एन्जॉय कर रहे थे।

तभी अशोक नितिन से बोला- क्या आप हमें थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ सकते हैं?
नितिन- साले, अब इतनी बेशर्मी कर ही ली है तो अब क्यों शर्माता है, वैसे भी हम कोई बच्चे थोड़े हैं, एडल्ट हैं, एक लाइव ब्लू मूवी देख लेंगे।

अशोक ने डिम्पी की तरफ देखा तो डिम्पी ने उसे आँख मार दी।

बस फिर क्या था, अशोक ने डिम्पी को अपनी गोद में खींच लिया ओर उसके होठों पर अपने होंठ जमा दिए। अब उसने डिम्पी की शर्ट भी उतार दी।
कमरे का माहौल अब गर्म हो रहा था, नितिन ने भी रजनी को बाहों में ले कर चूमा चाटी शुरू कर दी।
रमेश भी अपनी पैंट के ऊपर से अपने लंड को सहला रहा था और उसने मेरी ओर देखा। मैं भी अब गर्म हो रही थी। मैंने आँख के इशारे से उसे अपने रूम में चलने को कहा।

नितिन जो रजनी की शर्ट उतार रहा था, ने मुझे इशारा करते देख लिया था, उसने रमेश को इशारे में रिक्वेस्ट की कि हम न जाएँ और वहीं पर शुरू हो जाएँ।

अब रमेश मेरे पास आया और मेरे होंठों पर होंठ रख दिए। मैं भी उसका साथ देने लगी। अब रूम में उम्म्ह… अहह… हय… याह… सी.. सी.. पुच पुच की आवाज़ें मिक्स होकर सुनाई दे रही थीं।

इतने में अशोक और डिम्पी पूरे नंगे हो चुके थे और डिम्पी ने अशोक का लंड अपने मुंह में ले लिया।
नितिन और रजनी भी 69 की पोजीशन बना चुके थे।

हम भी कहाँ पीछे रहते, अब धीरे धीरे जाने अनजाने सभी लोग एक ही बेड पर इकट्ठे हो गए। मैं रमेश के साथ 69 की पोजीशन में थी घूम कर रमेश के नीचे आ गई।
हम बेड के किनारे पर थे, बीच में नितिन रजनी के ऊपर और दूसरी तरफ अशोक ने डिम्पी को घोड़ी बनाया।

मेरे से कण्ट्रोल नहीं हो रहा था, रमेश ने जैसे ही मेरी चूत के अंदर अपना लंड डाला, मेरी टाँगें अपने आप ही छत की तरफ उठ गई। हम तीनों जोड़ों के शरीर लगभग एक दूसरे को छू रहे थे।

जैसे ही नितिन ने रजनी की चूत में अपना लंड डाला और उसके उपर झुका तो वह मेरे बिल्कुल करीब था। तभी उसने रजनी को झटके मारते मारते मेरे मम्मों पर अपना हाथ रख दिया।

मैं और रमेश एकदम रुक गए। रमेश ने उसकी ओर देखा फिर कुछ सोचा और फिर मुझे चोदना शुरू कर दिया।
अब रमेश मुझे चोद रहा था और नितिन रजनी को चोदते हुए मेरे मम्मे दबा रहा था, मुझे भी अब मज़ा आने लगा था।

थोड़ी देर में सब कुछ शांत हो गया, हम वहाँ कुछ देर नंगे ही लेटे रहे और फिर धीरे धीरे सब को नींद आ गई।

6 बजे के आसपास हमारी नींद खुली, सबने बारी बारी स्नान किया और फिर हम लोग घूमने निकल गए।

रात 9 बजे वापिस आ कर डिनर लिया और उसके बाद लगभग 11 बजे तक बातें करते रहे।

बातें करते करते दोपहर वाली बातें शुरू हो गई। जैसे कि वो ये कर रहा था, वो ये कर रही थी वगैरह वगैरह!

तभी नितिन रमेश को बोला- यार, भाभी के मम्मे बड़े ज़बरदस्त हैं, क्या खिलाते हो?
‘ये राज़ की बात है! रमेश ने कहा।

‘नहीं यार बताओ न, मैं भी चाहता हूँ कि रजनी के मम्मे भी ऐसे हो।’
‘खिलाना तो एक राज़ है पर इतना है कि मैं इसकी मालिश बहुत करता हूँ, इसे भी यह पसंद है।’
‘क्या मैं एक बार इन्हें दुबारा देख और छू सकता हूँ?’

रमेश ने मेरी तरफ देखते हुए कहा- साले दिन में तो मज़ा ले लिया अब फिर दिल कर रहा है?
मैंने भी कोई आपत्ति ज़ाहिर नहीं की, अब आपत्ति लायक कुछ बचा ही नहीं था, मैं वैसे भी दोपहर को याद करके गर्म हो रही थी लेकिन अपनी भावनाओं को छुपाये थी।

नितिन मेरे पास आया और मेरे ब्लाउज के बटन खोलने लगा, थोड़ी देर में मेरी ब्रा भी उसने उतार दी और मेरे मम्मे दबाने लगा, फिर उसने चूसना शुरू कर दिया।
अशोक भी अब मेरे पास आ गया और उसने मेरा दूसरा मम्मा मुंह में ले लिया।

अब मेरे मुंह से सिसकारियाँ निकलने लगी थी।
उधर रमेश ने अपने कपड़े उतार दिए और रजनी और डिम्पी के बीच में जा बैठा। उसने रजनी की सलवार उतार दी और उसकी चूत में पहले उंगली करता रहा, फिर उसने वहाँ अपनी जीभ लगा दी।

डिम्पी भी कहाँ पीछे रहती, उसने रमेश का लंड रमेश के नीचे आ कर अपने मुंह में ले लिया।
इधर अब नितिन और अशोक मुझे धीरे धीरे कर के नंगी कर चुके थे, दोनों मेरे मुंह के सामने अपने अपने लंड खड़े कर के खड़े हो गए। मुझे संकोच हो रहा था, मैंने मना कर दिया।

तब दोनों ने पहले मेरी चूत में उँगलियाँ की फिर उसे चूसा। उन्होंने फिर अपने लंड मेरे मुंह के आगे कर दिए, मैंने फिर इंकार कर दिया।

तब रमेश मेरे पास आ गया और वो अपनी अपनी पत्नियों के पास चले गए। अब किसी से भी कण्ट्रोल करना मुश्किल हो रहा था।
फिर तीनों ने लगभग इकट्ठे चुदाई शुरू की, तीनों जोड़े एक दूसरे के इतने पास थे कि शरीर आपस में रगड़ खा रहे थे और कोई भी किसी का कोई भी अंग छू, दबा या चूम सकता था।

15 मिनट बाद यह खेल खत्म हो गया और हम अपने रूम में सोने चले गए।

अपने कमरे में पहुँच कर रमेश ने मेरे से पूछा कि मैंने अशोक और नितिन के लंड क्यों नहीं चूसे तो मैंने कहा कि मुझे डर था कि कहीं आपको बुरा न लगे और मुझे लगा कि पता नहीं यह गलत था या सही?
तो रमेश बोला- कुछ बातें मौके के हिसाब से सही होती हैं, आगे पीछे चाहे वो गलत हों। मैंने क्या बुरा मानना था, डिम्पी भी तो मेरा लंड चूस रही थी।

अगली सुबह हम जल्दी उठ गए क्योंकि उस दिन केम्पटी फाल और गनहिल जाने का प्रोग्राम था।
9 बजे हम नाश्ता वगैरह करके केम्पटी फाल देखने निकल गए, 12 बजे तक वहाँ मस्ती मारते रहे।

तभी अचानक मौसम बदल गया और बरसात शुरू हो गई, हमने गनहिल जाने का प्रोग्राम कैंसिल कर दिया।
अब हमने कोई मूवी देखने का प्रोग्राम बनाया और वासु थिएटर जहाँ ‘जिस्म’ मूवी लगी थी देखने गए।

लगभग 4 बजे हम अपने गेस्टहाउस वापिस पहुँच गए।
लंच तो अवेलेबल नहीं था हमने स्नैक्स वगैरह से गुजारा कर लिया।

कहानी जारी रहेगी।
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